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Friday, July 22, 2022

धान की खेती कैसे करें उन्नत आधुनिक खेती

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धान की खेती कैसे करें इसकी पूरी जानकारी यहाँ मिलेगा। अगर आप एक किसान है और धान की उन्नत एवं आधुनिक खेती करना करना चाहते है तब आपको इसकी खेती के तरीके जरूर मालूम होना चाहिए। धान के लिए खेत को तैयार कैसे करते है, बीज का चुनाव कैसे करते है, धान में लगने वाले कीट एवं रोग का नियंत्रण कैसे करेंगे इसकी जानकारी होना बहुत जरुरी है। एक किसान के लिए धान उगाने से लेकर फसल काटने तक क्या क्या सावधानी अपनाना होता है उसकी जानकारी होना जरुरी है।
खरीफ फसलों में धान प्रमुख फसल है। प्रदेश में गत 5 वर्षों में धान के अन्तर्गत क्षेत्रफल, उत्पादन एवं उत्पादकता के आंकड़े अनुसार प्रदेश में चावल की औसत उपज में वृद्धि हो रही है और अन्य प्रदेशों की तुलना में बहुत कम है। इसकी उत्पादकता बढ़ाने की काफी सम्भावना है। यह तभी सम्भव हो सकता है जब सघन विधियों को ठीक प्रकार से अपनाया जाय। धान की अधिक पैदावार प्राप्त करने हेतु निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है।
  • स्थानीय परिस्थितियों जैसे क्षेत्रीय जलवायु, मिट्टी, सिंचाई साधन, जल भराव तथा बुवाई एवं रोपाई की अनुकूलता के अनुसार ही धान की संस्तुत प्रजातियों का चयन करें।
  • शुद्ध प्रमाणित एवं शोधित बीज बोयें।
  • मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरकों, हरी खाद एवं जैविक खाद का समय से एवं संस्तुत मात्रा में प्रयोग करें।
  • उपलब्ध सिंचन क्षमता का पूरा उपयोग कर समय से बुवाई/रोपाई करायें।
  • पौधों की संख्या प्रति इकाई क्षेत्र सुनिश्चित की जाय।
  • कीट रोग एवं खरपतवार नियंत्रण किया जाये।
  • कम उर्वरक दे पाने की स्थिति में भी उर्वरकों का अनुपात 2:1:1 ही रखा जाय।
  • धान की खेती कैसे करें सम्पूर्ण जानकारी

    01. भूमि की तैयारी

    गर्मी की जुताई करने के बाद 2-3 जुताइयां करके खेत की तैयारी करनी चाहिए। साथ ही खेत की मजबूत मेड़बन्दी भी कर देनी चाहिए ताकि खेत में वर्षा का पानी अधिक समय तक संचित किया जा सके। अगर हरी खाद के रूप में ढैंचा/सनई ली जा रही है तो इसकी बुवाई के साथ ही फास्फोरस का प्रयोग भी कर लिया जाय। धान की बुवाई/रोपाई के लिए एक सप्ताह पूर्व खेत की सिंचाई कर दें, जिससे कि खरपतवार उग आवे, इसके पश्चात् बुवाई/रोपाई के समय खेत में पानी भरकर जुताई कर दें।

    02. धान की प्रजातियों का चयन

    प्रदेश में धान की खेती असिंचित व सिंचित दशाओं में सीधी बुवाई एवं रोपाई द्वारा की जाती है। विभिन्न जलवायु, क्षेत्रों और परिस्थितियों के लिए धान की संस्तुत प्रजातियों के गुण एवं विशेषतायें नीचे दिया गया है।

    1. असिंचित दशा शीघ्र पकने वाली

    • सीधी बुवाई – गोविन्द‚नरेन्द्र-118 नरेन्द्र-97, गोविन्द‚नरेन्द्र-118 नरेन्द्र-97, शुष्क सम्राट,
    • रोपाई – गोविन्द‚ नरेन्द्र-80, शुष्क सम्राट, मालवीय धान-2, नरेन्द्र-118

    2. सिंचित दशा शीघ्र पकने वाली (100-120) दिन

    नरेन्द्र-118 नरेन्द्र-97 शुष्क सम्राट मालवीय धान-2, मनहर, पूसा-169, नरेन्द्र-80, पन्त धान-12, पन्त धान-10

    3. मध्यम अवधि में पकने वाली (120-140 दिन)

    पन्त धान-4, सरजू-52, नरेन्द्र-359, पूसा-44, नरेन्द्र धान-2064, नरेन्द्र धान-3112-1

    4. देर से पकने वाली (140 दिन से अधिक)

    • सुगन्धित धान – टा-3, पूसा बासमती-1, हरियाणा-बासमती-1, पूसा सुगन्ध-4 एवं 5, बल्लभ बासमती 22, मालवीय सुगंध 105, तारावडी बासमती, स्वर्णा, महसूरी
    • ऊसरीली – साकेत-4‚ झोना-349 साकेत-4, बासमती-370, पूसा बासमती-1, वल्लभ बासमती 22, मालवीय सुगंध 105, नरेन्द्र सुगंध

    04. शुद्ध एवं प्रमाणित बीज का चयन

    प्रमाणित बीज से उत्पाद अधिक मिलता है और कृषक अपनी उत्पाद (संकर प्रजातियों को छोड़कार) को ही अगले बीज के रूप में सावधानी से प्रयोग कर सकते है। तीसरे वर्ष पुनः प्रमाणित बीज लेकर बुवाई की जावे।

    05. उर्वरकों का संतुलित प्रयोग एवं विधि

    उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना उपयुक्त है। यदि किसी कारणवश मृदा का परीक्षण न हुआ तो उर्वरकों का प्रयोग निम्न प्रकार किया जायः

    सिंचित दशा में रोपाई (अधिक उपजदानी प्रजातियां : उर्वरक की मात्राः किलो/हेक्टर)

    प्रजातियांनत्रजनफास्फोरसपोटाश
    शीघ्र पकने वाली1206060
    प्रयोग विधिः नत्रजन की एक चौथाई भाग तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूर्ण मात्रा कूंड में बीज के नीचे डालें, शेष नत्रजन का दो चौथाई भाग कल्ले फूटते समय तथा शेष एक चौथाई भाग बाली बनने की प्रारम्भिक अवस्था पर प्रयोग करें।
    प्रजातियांनत्रजनफास्फोरसपोटाश
    मध्यम देर से पकने वाली प्रयोग विधि1506060
    सुगन्धित धान (बौनी) प्रयोग विधि1206060

    देशी प्रजातियां : उर्वरक की मात्रा-कि०/हे०



    शीघ्र पकने वाली603030
    मध्यम देर से पकने वाली603030
    सुगन्धित धान603030
    प्रयोग विधिः रोपाई के सप्ताह बाद एक तिहाई नत्रजन तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के पूर्व तथा नत्रजन की शेष मात्रा को बराबर-बराबर दो बार में कल्ले फूटते समय तथा बाली बनने की प्रारम्भिक अवस्था पर प्रयोग करें। दाना बनने के बाद उर्वरक का प्रयोग न करें।

    सीधी बुवाई

    उपज देने वाली प्रजातियाँ

    नत्रजनफास्फोरसपोटाश
    100-12050-6050-60
    प्रयोग विधिः फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई से पूर्व तथा नत्रजन की एक तिहाई मात्रा रोपाई के 7 दिनों के बाद, एक तिहाई मात्रा कल्ले फूटते समय तथा एक तिहाई मात्रा बाली बनने की अवस्था पर टापड्रेसिंग द्वारा प्रयोग करें।

    देशी प्रजातियां: उर्वरक की मात्राः किलो/हेक्टर

    नत्रजनफास्फोरसपोटाश
    603030
    प्रयोग विधिः तदैव वर्षा आधारित दशा में: उर्वरक की मात्रा- किलो/हेक्टर

    देशी प्रजातियां : उर्वरक की मात्रा-कि०/हे०

    नत्रजनफास्फोरसपोटाश
    603030
    प्रयोग विधिः सम्पूर्ण उर्वरक बुवाई के समय बीज के नीचे कूंडों में प्रयोग करें।

    नोटः लगातार धान- गेहूँ वाले क्षेत्रों में गेहूँ धान की फसल के बीच हरी खाद का प्रयोग करें अथवा धान की फसल में 10-12 टन/हे० गोबर की खाद का प्रयोग करें।

    06. जल प्रबन्ध

    देश में सिंचन क्षमता के उपलब्ध होते हुए भी धान का लगभग 60-62 प्रतिशत क्षेत्र ही सिचिंत है, जबकि धान की फसल को खाद्यान फसलों में सबसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है। फसल को कुछ विशेष अवस्थाओं में रोपाई के बाद एक सप्ताह तक कल्ले फूटने, बाली निकलने फूल, खिलने तथा दाना भरते समय खेत में पानी बना रहना चाहिए। फूल खिलने की अवस्था पानी के लिए अति संवेदनशील हैं। परीक्षणों के आधार पर यह पाया गया है कि धान की अधिक उपज लेने के लिए लगातार पानी भरा रहना आवश्यक नहीं है।

  • इसके लिए खेत की सतह से पानी अदृश्य होने के एक दिन बाद 5-7 सेमी० सिंचाई करना उपयुक्त होता है। यदि वर्षा के अभाव के कारण पानी की कमी दिखाई दे तो सिंचाई अवश्य करें। खेत में पानी रहने से फास्फोरस, लोहा तथा मैंगनीज तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है और खरपतवार भी कम उगते हैं।

  • धान में फसल सुरक्षा

    धान के प्रमुख कीट

    1. दीमक
    2. जड़ की सूड़ी
    3. पत्ती लपेटक
    4. नरई कीट
    5. गन्धी बग
    6. पत्ती लपेटक
    7. सैनिक कीट
    8. हिस्पा
    9. बंका कीट
    10. तना बेधक
    11. हरा फुदका
    12. भूरा फुदका
    13. सफेद पीठ वाला फुदका
    14. गन्धी बग

    धान में लगने वाले ये प्रमुख कीट है। अगर समय रहते इसका नियंत्रण नहीं किया गया तब फसल को काफी नुकसान पहुंचा सकते है। इसके नियंत्रण के लिए इसे  धान में लगने वाले प्रमुख कीट एवं नियंत्रण के उपाय

    प्रमुख रोग

    1. सफेदा रोग
    2. खैरा रोग
    3. शीथ ब्लाइट
    4. झोंका रोग
    5. भूरा धब्बा
    6. जीवाणु झुलसा
    7. जीवाणु धारी
    8. मिथ्य कण्ड   

    9. sabhar achhiketi.com

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Saturday, July 09, 2022

Sugar Free Mango : अब डायबिटीज के मरीज भी ले सकेंगे आम का स्वाद, पकने से पहले 16 बार बदलता है रंग

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 News18 हिंदी: Sugar Free Mango : अब डायबिटीज के मरीज भी ले सकेंगे आम का स्वाद, पकने से पहले 16 बार बदलता है रंग. https://hindi.news18.com/news/nation/now-diabetic-patients-will-also-taste-sugar-free-mango-color-changes-16-times-before-ripening-4376630.html


SUGAR FREE Mango : बिहार में जिस आम की चर्चा हो रही, उसे अमेरिकन ब्यूटी नाम दिया गया है. दरअसल बिहार के मुजफ्फरपुर के एक किसान ने इस आम की बागवानी की है. इसी आम के बगीचे की चर्चा इन दिनों पूरे बिहार में हो रही है, क्योंकि आम का आकार, शेप और रंग दूसरे आमों से कई अलग है. ये कोई मामूली आम नहीं है, बल्कि दावा किया गया है कि ये आम (Mango) पकने से पहले 16 बार अपना रंग बदलता है. साथ ही इसको शुगर फ्री आम भी बताया जा रहा है.

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Monday, July 04, 2022

जापान की आम की प्रजाति

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 दुनिया का सबसे महंगा आम इसका वजन एक आम का 350  ग्राम होता है लाखों में है 1 किलो आम की कीमत 2.7 लाख रुपया प्रति किलो है लाल और पर्पल रंग का दिखने वाला जापान का मिया जाकि आम की रखवाली के लिए सिक्योरिटी गार्ड तैनात हैं या बिल्कुल डायनासोर के अंडे जैसा दिखता है



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खेती के उन्नत विधि

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Sunday, July 03, 2022

गन्ने की फसल में चोटी बधेक कीट* *(Top borer)*

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   इस कीट की सुंडी अवस्था ही हानि पहुंचाती है। यह कीट पूरे वर्ष में 4 से 5 पीढ़ियां पाई जाती हैं। इसे किसान कन्फ्ररहा, गोफ का सूखना आदि नामों से जानते हैं। 

 *कीट की पहचान -* इसका प्रौढ़ कीट चांदी जैसे सफेद रंग का होता है तथा मादा कीट के उदर भाग के अंतिम खंड पर हल्के गुलाबी रंग के बालों का गुच्छा पाया जाता है। इस कीट की सुंडी हल्के पीले रंग की होती है, जिस पर कोई धारी नहीं होती है।  

 *हानियां -* इस कीट की मादा सुंडी पौधों की दूसरी या तीसरी पत्ती की निचली सतह पर मध्य शिरा के पास समूह में अंडे देती है। इसकी सुंडी पत्ती की मध्य शिरा से प्रवेश कर गोंफ़ तक पहुंच जाती है तथा पौधे के वृद्धि वाले स्थान को खाकर नष्ट कर देती है,जिससे कि गन्ने की बढ़वार रुक जाती है। प्रभावित पौधे की गॉफ छोटी तथा कत्थई रंग की हो जाती है, जो कि खींचने पर आसानी से नहीं निकलती है। गन्ने की पत्ती की मध्य शिरा पर लालधारी का निशान तथा गॉफ़ के किनारे की पत्तियों पर गोल छर्रे जैसा छेद पाया जाता है। इस कीट की प्रथम एवं द्वितीय पीढ़ी के आपतन से गन्ने के पौधे पूर्ण रूप से सूख जाते हैं तथा तृतीय पीढ़ी से पौधों की बढ़वार रुक जाने के कारण उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है व पौधों की लंबाई कम हो जाती है। इस कीट के आपतन से 20 से 35 प्रतिशत तक हानि होती है। इस कीट की तीसरी एवं चौथी पीढ़ी के आपतन से गन्ने में बंची टॉप का निर्माण हो जाता है। 

 *जीवन चक्र-* मादा अपने जीवन काल में 250 से 300 अंडे कई अंड समूह में देती है। जिनकी संख्या 6 से 70 तक रहती है। इस कीट का अंड काल 6 से 8 दिन, सुंडी काल 36 से 40 दिन, एवं प्यूपा काल 8 से 10 दिन तक रहता है तथा जीवन काल 53 से 65 दिन तक रहता है। 

 *पीढ़ियां-

प्रथम - मार्च से अप्रैल तक 

द्वितीय - मई के द्वितीय सप्ताह से जून के द्वितीय सप्ताह तक 

तृतीय - जून के तृतीय सप्ताह से अगस्त के प्रथम सप्ताह तक

 चतुर्थ - अगस्त के प्रथम सप्ताह से मध्य सितंबर तक

 पंचम - मध्य सितंबर से फरवरी के अंतिम सप्ताह तक।

 *नियंत्रण -* 1- प्रथम एवं द्वितीय पीढ़ी से प्रभावित पौधों को सुंडी सहित पतली खुर्पी की सहायता से जमीन की गहराई से काट कर खेत से निकाल कर नष्ट कर देना चाहिए। 

2- प्रथम एवं द्वितीय पीढ़ी को नियंत्रण के लिए फरवरी - मार्च में गन्ना बुवाई के समय कीट नाशक वर्टोको 5 से 7 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से कुड़ों में प्रयोग करना चाहिए। 

3- कीटनाशक वार्टको 5 से 7 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक तृतीय पीढ़ी के लिए पर्याप्त नमी की दशा में पौधों की जड़ों के पास प्रयोग करना चाहिए।

4 - 150 ML कोराजन 400 लीटर पानी में घोल बनाकर दूसरी एवं तीसरी पीढ़ी के लिए मई के अंतिम सप्ताह से जून के प्रथम सप्ताह में जड़ों के पास डेचिंग करें तथा 24 घंटे के अंदर खेत की सिंचाई अवश्य कर दें।  बीके शुक्ला  अपर गन्ना आयुक्त गन्ना एवं चीनी विभाग उत्तर प्रदेश सरकार


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Wednesday, June 29, 2022

जैविक खाद बनाने का भरोसेमंद एवं सस्ता विकल्प है ‘प्रोम’ (PROM)

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जैविक खाद बनाने का भरोसेमंद एवं सस्ता विकल्प है ‘प्रोम’ (PROM)

26 Jul 2019



क्या आप जानते हैं फसल के उत्पादन में फॉस्फेट तत्व का प्रमुख योगदान होता है! रासायनिक उर्वरकों के लगातार उपयोग करने से खेती की लागत भी बढ़ती जा रही है, जमीन सख्त हो रही है, भूमि में पानी सोखने की क्षमता घटती जा रही है। वहीं दूसरी तरफ भूमि तथा उपभोक्ताओं के स्वास्थ पर प्रतिकूल असर भी पड़ रहा है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए नया उत्पाद विकसित किया गया है, जिसमें कार्बनिक खाद के साथ-साथ रॉक फॉस्फेट की मौजूदगी भी होती है। जिसे हम प्रोम के नाम से जानते हैं।




‘प्रोम’ को विस्तार पूर्वक समझते हैं


प्रोम (फॉस्फोरस रिच आर्गेनिक मैन्योर) तकनीक से जैविक खाद घर पर भी तैयार की जा सकती है। प्रोम, जैविक खाद बनाने की एक नई तकनीक है। जैविक खाद बनाने के लिए गोबर तथा रॉक फॉस्फेट को प्रयोग में लाया जाता है। रॉक फॉस्फेट की मदद से रासायनिक क्रिया करके सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) तथा डाई अमोनियम फॉस्फेट (DAP) रासायनिक उर्वरक तैयार किए जाते हैं।


प्रोम में विभिन्न फॉस्फोरस युक्त कार्बनिक पदार्थों जैसे- गोबर खाद, फसल अपशिष्ट, चीनी मिल का प्रेस मड, जूस उद्योग का अपशिष्ट पदार्थ, विभिन्न प्रकार की खली और ऊन के कारखानों का अपशिष्ट पदार्थ आदि को रॉक फॉस्फेट के साथ कम्पोस्टिंग करके बनाया जाता है। प्रोम मिनरल उर्वरक एवं जैविक खाद का मिश्रण है जो केवल कृषि में उपयोग के लिये काम में लाया जाता है। प्रोम का उपयोग पौधों को फॉस्फोरस (फॉस्फोरस पादप पोषक तत्व) उर्वरक प्रदान करने के लिए किया जाता है। जीवाणु राॅक फोसफोरस को पचा कर उसे गोबर में उपलब्ध करते हेै इस कारण प्रोम शुद्व रुप से जैविक है।


प्रोम से क्या-क्या फायदे हैं :


जैविक खाद से अनाज, दालें, सब्जी व फलों की गुणवत्ता बढ़ाने से अच्छा स्वाद मिलता है।

रोगों में रोधकता आने से मानव के स्वास्थ्य पर बुरे प्रभाव नहीं पड़ते हैं।

प्रोम तकनीक से जैविक खाद बनाने की विधि बहुत ही सरल है।

प्रत्येक किसान, जिसके यहां गोबर उपलब्ध है, आसानी से अपने घर पर जैविक खाद बनाकर तैयार कर सकता है।

किसान DAP व SSP खरीदने पर जितने पैसा खर्च करता है उससे कम पैसे में प्रोम तकनीक से जैविक खाद बनाकर भरपूर फसल पैदा कर सकता है।

प्रोम मिट्टी को नरम बनाने के साथ-साथ पोषक तत्वों की उपलब्धता लंबे समय तक बनाये रखता है।

प्रोम लवणीय व क्षारिय भूमि में भी प्रभावी रूप में काम करता है जबकि DAP ऐसी भूमि मे काम नहीं करता है।

जैविक खाद को घर पर बनाने की प्रक्रिया :


‘फॉस्फोरस रिच जैविक खाद’ घर पर भी रॉक फॉस्फेट के द्वारा बनाई जा सकती है। रॉक फॉस्फेट के अलग-अलग रंग होते हैं, रॉक फॉस्फेट एक तरह का पत्थर है जिसके अंदर 22 फीसदी फॉस्फोरस मौजूद है जो कि फिक्स फोम में होता है। प्रोम बनाने के लिए कमर्शियल में 10 फीसदी के आसपास फॉस्फोरस मेंटेन किया जाता है लेकिन हम घर पर बनाने के लिए 18%,19% या 20 फीसदी तक फॉस्फोरस इस्तेमाल में ले सकते हैं। इसे बनाने के लिए किसी भी जानवर का गोबर ले सकते हैं, घर में मौजूद कूड़ा-कर्कट या फिर फसलों के अवशेष जिससे खाद बनाते हैं (प्लांट बेस्ड) वो भी ले सकते हैं। Dr absinth kisan sankalp bazar

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Monday, June 27, 2022

पशुपालन एवं वेटरनरी कृत्रिम गर्भाधान के विभिन्न कोर्सों में दाखिल लेकर रोजगार प्राप्ति करें

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आजकल बेरोजगारी के समय में कृषि और पशुपालन रोजगार की अपार संभावना है बिचपुरी आगरा में संचालित वेटरनरी कॉलेज विभिन्न कोर्सों में दाखिल होकर सर्टिफिकेट प्राप्त कर सकते हैं और कुमार प्रशिक्षण प्राप्त कर  स्वयं निजी का कार्य किसी कंपनी में नौकरी इत्यादि कर सकते हैं 

http://aitajagra.com/ कृपया डिटेल जानकारी वेबसाइट एवं कॉलेज से प्राप्त कर सकतेे हैं

5 वी, 8 वी, 10 वी, 12वी पास छात्र के लिए सुनेहरा अवसर

 *कृत्रिम गर्भाधान प्रशिक्षण संस्थान*

भारत सरकार सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त

NSDC , Agriculture council  of India 


कोर्स के बाद सुनिश्चित रोजगार की गारण्टी


*कोर्स का नाम* Artificial Insemination Technician (कृत्रिम गर्भाधान तकनीशियन)🐄🐂🐃

*अवधि* 3 माह

*योग्यता* 8 और 10 पास

*फीस* 30000 मात्र 


*कोर्स का नाम*  Dairy Farming/ Enterpreneur 

(डेयरी फार्मिंग / उद्यमी)🐃🥛

*अवधि* 1 माह

*योग्यता* 5 वी पास

*फीस* 15000/- मात्र 


*कोर्स का नाम*  Dairy Farmer Supervisor

(डेयरी किसान पर्यवेक्षक)🥛

*अवधि* 2 माह

*योग्यता* 12 वी पास

*फीस* 25000/- मात्र


*कोर्स का नाम* Veterinary Clinical 🏥Assistant

(पशु चिकित्सा नैदानिक सहायक)🐕🐩🦮🐕‍🦺🐈🐈‍⬛

*अवधि* 2 sal

*योग्यता* 12 वी पास

*फीस* 60000/- मात्र


*कोर्स का नाम*  Animal Health Worker (first Aid)

पशु स्वास्थ्य कार्यकर्ता (प्राथमिक चिकित्सा)🐃🦮🐈🐐🐎

*अवधि* 2 माह



*योग्यता* 8 वी पास

*फीस* 20000/- मात्र


*आज ही प्रवेश ले और अपना कैरियर बनाएं*


कृत्रिम गर्भाधान प्रशिक्षण संस्थान

पथौली नहर, जयपुर हाईवे बिचपुरी आगरा।

मोबाइल नंबर- 9520978721


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