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Wednesday, June 22, 2022

सीएसए ने राई की नई प्रजाति सुरेखा

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*सीएसए ने राई की नई प्रजाति सुरेखा ( के एम आर 16-2) की विकसित* कानपुर नगर। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर के तिलहन अनुभाग द्वारा राई की नई प्रजाति सुरेखा (केएमआर 16-2) विकसित की है। राई वैज्ञानिक डॉ महक सिंह ने बताया कि भारत सरकार द्वारा यह प्रजाति नोटिफाइड हो चुकी है।उन्होंने बताया कि दिनांक 17 जून 2022 को आईसीएआर के उप महानिदेशक फसल विज्ञान डॉ टी आर शर्मा की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय बीज विमोचन समिति की 88 वीं बैठक में राई की सुरेखा प्रजाति को नोटिफाइड किया गया है। डॉक्टर महक सिंह ने बताया कि यह प्रजाति उच्च तापक्रम के प्रति प्रारंभिक अवस्था में सहिष्णु है तथा अगेती एवं समय से बुवाई हेतु संस्तुति है उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के सभी जलवायु क्षेत्रों हेतु सिंचाई दशा के लिए संस्तुति है। उन्होंने बताया कि इस प्रजाति का उत्पादन 25 से 28 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। तथा 125 से 130 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। डॉ सिंह ने कहा कि इस प्रजाति में 41.2 से 42.6% तेल की मात्रा पाई जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रजातिअल्टरनरिया ब्लाइट एवं व्हाइट रस्ट के प्रति प्रतिरोधी है। उन्होंने बताया कि राई की उर्वशी प्रजाति से 16.69% अधिक उत्पादन देती है। निदेशक शोध डॉक्टर करम हुसैन ने बताया कि यह प्रजाति उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए काफी लाभदायक सिद्ध होगी।विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर डीआर सिंह ने राई की नवीन प्रजाति को विकसित करने वाले वैज्ञानिकों को बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं।

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*फसल संबंधित सलाह डॉक्टर ए के सिंह

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:* •वर्तमान मौसम को ध्यान में रखते हुए किसानों को धान की नर्सरी तैयारी करने की सलाह है। एक हैक्टेयर क्षेत्रफल में रोपाई करने हेतु लगभग 800-1000 वर्गमीटर क्षेत्रफल में पौध तैयार करना पर्याप्त होता है। नर्सरी के क्षेत्र को 25 से 1.5 मीटर चौडी तथा सुविधानुसार लम्बी क्यारियों में बाँटे। पौधशाला में बुवाई से पूर्व बीजोपचार के लिए 5.0 किलोग्राम बीज के लिए बावस्टिन 10-12 ग्राम और 1 ग्राम स्ट्रैप्टोसाइक्लिन को 10 लीटर पानी में घोल लें। आवश्यकतानुसार इस घोल को बनाकर इसमें 12-15 घण्टे के लिए बीज को डाल दें। उसके बाद बीज को बाहर निकालकर किसी छायादार स्थान में 24-36 घण्टे के लिए ढककर रखें और पानी का हल्का-हल्का छिडकाव करते रहें। बीज में अंकुर निकलने के बाद पौधशाला में छिडक दें। अधिक उपज देने वाली किस्में:- पूसा बासमती 1692, पूसा बासमती 1509, पूसा बासमती 1885, पूसा बासमती 1886, पूसा बासमती 1847, पूसा बासमती 1637, पूसा 44, पूसा 1718, पूसा बासमती 1401, पूसा सुगंध 5, पूसा सुगंध 4 (पूसा 1121), पंत धान 4, पंत धान 10। •खरीफ मक्का की बुवाई के लिए खेतों की तैयारी करें, साथ ही उन्नतशील संस्तुति संकुल प्रजातियां- कंचन, गौरव,स्वेता, आजाद उत्तम एवं संकर प्रजातियां- प्रकाश, वाई -1402, बायो-9681, प्रो -316, डी-9144, दिकाल्ब- 7074, पीएचबी-8144, दक्कन 115, एम.एम.एच.-133 आदि में से एक किसी एक प्रजाति की बुवाई के लिए खाद एवं बीज की व्यवस्था करें। मक्के की संकुल प्रजाति की बुवाई के लिए 20 -25 किलोग्राम बीज/हेक्टयर तथा शंकर प्रजाति 18 -20 किलोग्राम बीज / हेक्टेयर की दर से बुवाई करें। •अरहर की बुवाई इस सप्ताह कर सकते है। अच्छे अंकुरण के लिए बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी का ध्यान रखें। बीज किसी प्रमाणित स्रोत से ही खरीदें। अच्छे अंकुरण के लिए खेत में पर्याप्त नमी होनी आवश्यक है। किसानों से यह आग्रह है कि वे बीजों को बोने से पहले अरहर के लिए उपयुक्त राईजोबियम तथा फास्फोरस को घुलनशील बनाने वाले जीवाणुओं (पीएसबी)फँफूद के टीकों से उपचार कर लें। इस उपचार से फसल के उत्पादन में वृद्धि होती है। उप्युक्त किस्में:- पूसा अरहर-16, पूसा 2001, पूसा 2002, पूसा 991, पूसा 992, पारस तथा मानक। •यह समय चारे के लिए ज्वार की बुवाई के लिए उप्युक्त हैं अतः किसान पूसा चरी-9, पूसा चरी-6 या अन्य सकंर किस्मों की बुवाई करें बीज की मात्रा 40 किलोग्राम/हैक्टर रखें तथा लोबिया की बुवाई का भी यह उप्युक्त समय है। *फसल सुरक्षा:* •धान की पौधशाला मे यदि पौधों का रंग पीला पड रहा है तो इसमे लौह तत्व की कमी हो सकती है। पौधों की ऊपरी पत्तियॉ यदि पीली और नीचे की हरी हो तो यह लौह तत्व की कमी दर्शाता है। इसके लिए 0.5 % फेरस सल्फेट +0.25 % चूने के घोल का छिडकाव करें। •बैगन, मिर्च, अगेती फूलगोभी के पौध की बुवाई करे। मिर्च के खेत में विषाणु रोग से ग्रसित पौधों को उखाड़कर जमीन में गाड़ दें। उसके उपरांत इमिडाक्लोप्रिड @ 0.3 मि.ली./लीटर की दर से छिड़काव करें। •फलों के नऐ बाग लगाने वाले गड्डों की खुदाई कर उनको खुला छोड दें ताकि हानिकरक कीटो-रोगाणु तथा खरपतवार के बीज आदि नष्ट हो जाए।आम, अमरूद, नींबू, बेर, अंगूर, पपीता व लीची आदि के बागों में सिंचाई का कार्य करें। पशु पालन: •पशुओ को दिन के समय छायादार और सुरक्षित स्थानों मे बाँधे। पशुशाला मे बोरे का पर्दा डाले और उस पर पानी छिड़काव कर ठंडा रखे। पशुओं को पीने के लिए पर्याप्त मात्रा मे ताजा और शुद्ध पानी उपलब्ध कराएं। तेज़ धूप से काम करके आए पशुओं को तुरंत पानी न पिलाए, आधा घंटे सुस्ताने के बाद पानी पिलाए। पशुओं को सुबह और शाम नहलाए। •पेट मे कीड़ों से बचाव हेतु पशुओं को कृमिनाशक दवा का पान कराए। खुरपका-मुँहपका रोग की रोकथाम हेतु एफ.एम.डी. वैक्सीन से तथा लंगड़िया बुखार की रोकथाम हेतु बी.क्यू. वैक्सीन से पशुओं का टीकाकरण अवश्य कराए। पशुओं मे गलाघोटूँ एवं फड़ सूजन के रोकथाम हेतु टीकाकरण कराए। शाम के समय पशुओं के पास नीम की पत्तियों का धुआँ करे ताकि मच्छर व मक्खी भाग जाए। *मुर्गी पालन:* किसानों को सलाह दी जाती है कि वे मुर्गियों को भोजन में पूरक आहार, विटामिन और ऊर्जा खाद्य सामग्री मिलाएं और साथ ही साथ कैल्शियम सामग्री भी मुर्गियों को दें। मुर्गियों के पेट में कीड़ो की रोकथाम (डिवमिर्ग) के लिए दवा दें। मुर्गियों को गर्मी से बचाव हेतु मुर्गी हाउस में पर्दे, पंखे और वेंटिलेशन की व्यवस्था करें। मुर्गियों को गर्मी से बचाने के लिए मुर्गी घर में लगे हुए जुट के पर्दो पर पानी के छींटे मारे जिससें ठंडक बनी रहे। डाक्टर अजित प्रताप सिंह, संकल्प किसान बाज़ार

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Saturday, June 18, 2022

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Disscusion with Akhilesh Bahadur Pal on importance of agriculture farming

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Friday, June 03, 2022

आम के बाग लगाने के पूर्व जानने योग्य प्रमुख बातें

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डॉ एसके सिंह प्रोफेसर , प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं एसोसिएट डायरेक्टर रिसर्च डॉ राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा ,समस्तीपुर, बिहार-848 125 sksraupusa@gmail.com/sksingh@rpcau.ac.in उत्तर भारत में आम के बाग़ को लगाने का सर्वोत्तम समय जून के अंतिम सप्ताह से लेकर सितम्बर माह तक है , लेकिन इसकी तैयारी मई -जून से ही शुरू कर देते है .आम के बाग की स्थापना एक दीर्घकालिक निवेश है; इसलिए उचित योजना और लेआउट एक प्रमुख भूमिका निभाता है। यदि आप आम का बाग लगाना चाहते है तो आप को बाग लगाने से पूर्व निम्नलिखित बातों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए यथा..... 1. साइट चयन  आम के लगाने की जगह ( साइट) को मुख्य सड़क और बाजार के पास होना चाहिए क्योंकि इसमे लगने वाली विभिन्न जैसे खाद , उर्वरक एवं पेस्टीसाइड की समय पर खरीद और फसल की समय पर विक्री के लिए पास होना चाहिए।  आम की वृद्धि और उत्पादन के लिए उचित सिंचाई की सुविधा, उपयुक्त जलवायु और अच्छी मिट्टी का होना आवश्यक है। 2. क्षेत्र की तैयारी  गहरी जुताई के पश्चात हैरो चलाकर मिट्टी को भुरभुरा एवम् खरपतवार को एकत्र कर लेते है।  भूमि को अच्छी तरह से समतल किया जाना चाहिए और अधिक वर्षा के पानी की उचित सिंचाई और जल निकासी के लिए एक दिशा में हल्का ढलान प्रदान किया जाता है। 3. लेआउट और रोपण दूरी  यह पौधों को सामान्य विकास के लिए पर्याप्त स्थान प्रदान करता है, उचित परस्पर संचालन की अनुमति देता है और हवा और सूरज की रोशनी के पर्याप्त मार्ग प्रदान करता है।  रोपण की दूरी मिट्टी की प्रकृति, सैपलिंग प्रकार (ग्राफ्ट्स / सीडलिंग) और विविधता की शक्ति जैसे कारकों पर निर्भर करती है।  खराब मिट्टी का पौधा धीरे-धीरे बढ़ता है और भारी मिट्टी में, पौधे बौने रह जाते हैं, कम जगह की आवश्यकता होती है। लंबी प्रजाति के आम(मालदा या लंगड़ा, चौसा, फजली)को 12m × 12 के अंतर पर लगाई जाती है बौनी प्रजाति के आम (दशहरी, नीलम, तोतापुरी और बॉम्बे ग्रीन) को 10 मीटर × 10 मीटर की दूरी पर लगाए गए  डबल रो हेज सिस्टम: (5 मी × 5 मी) × 10 मी: 220 पौधे प्रति हेक्टेयर (बौनी किस्में)।  बौनी किस्म: आम्रपाली 2.5m × 2.5 m (1600 पौधे / हेक्टेयर) में लगाया जाता है 4. गड्ढे तैयार करना  गड्ढे का आकार मिट्टी के प्रकार पर निर्भर करता है।  यदि हार्ड पैन आधे मीटर की गहराई में है, तो गड्ढे का आकार 1मीटर × 1मीटर × 1मीटर होना चाहिए  यदि मिट्टी उपजाऊ है और हार्ड पैन नहीं है, तो गड्ढे का आकार 30 सेमी × 30 सेमी × 30 सेमी होना चाहिए।  गड्ढे वाली मिट्टी के ऊपरी आधे हिस्से और निचली आधी मिट्टी को अलग-अलग रखा जाता है और अच्छी तरह से सड़ी कम्पोस्ट 50 किग्रा, सुपर फॉस्फेट सिंगल (SSP) 100 ग्रा और मुइरेट ऑफ़ पोटाश ( एमओपी) 100 ग्रा के साथ मिलाया जाता है।  गड्ढे मई -जून के गर्मियों के दौरान खोद कर 2-4 सप्ताह के लिए छोड़ देते है जिससे मिट्टी सूरज के संपर्क में आते हैं और नीचे मिट्टी एवं शीर्ष के मिट्टी के मिश्रण से भर दिए जाते हैं।  भरने के बाद गड्ढों की अच्छी तरह से सिंचाई की जाती है। 5. रोपण का समय  उत्तर भारत और पूर्वी भारत में जून से सितंबर

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Friday, May 27, 2022

ड्रैगन फ्रूट (फल) की खेती से लाभ कमाएं

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भावनगर/अहमदाबाद। गुजरात के ड्रैगन फ्रूट (फल) को राज्य सरकार ने "कमलम" नाम दिया है। सरकार के इस निर्णय के बाद से उत्तर गुजरात, सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात में इसके उत्पादन में रुचि बढ़ी। भावनगर जिले के वावड़ी गांव के एक किसान ने कम पानी और खर्च करके सिर्फ चार बीघा जमीन पर ड्रैगन फ्रूट की खेती से 3.5 लाख रुपये की कमाई की है। सौराष्ट्र के भावनगर जिले के वावड़ी गांव के किसान ने रमेशभाई मकवाना पारंपरिक खेती की तुलना में कम पानी में ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे हैं। रमेशभाई जामनगर से ड्रैगन फ्रूट के पौधे लाए। ड्रैगन फ्रूट के एक पौधे की कीमत 48 रुपये है और वर्तमान में रोपण के 15 महीने बाद फल आते हैं। रमेशभाई ने चार बीघा जमीन में ड्रैगन फ्रूट की खेती कर सालाना 3.5 लाख रुपये की कमाई की है। इस संबंध में रमेशभाई ने बताया कि वह भावनगर जिले में पिछले एक-दो साल से ड्रैगन फ्रूट की फसल कर रहे हैं। भावनगर में अवनिया, तलाजा, दिहोर, त्रापज, सीहोर और पालिताना ड्रैगन फ्रूट की खेती की जाती है। उन्हाेंने बताया कि गुलाबी, लाल और सफेद रंग की तीन तरह के ड्रैगन फ्रूट की खेती होती है। उन्होंने बताया कि इस फल से प्रति बीघा 1.10 लाख रुपये तक आमदनी होती है। उल्लेखनीय है कि ड्रैगन फ्रूट की कमल जैसी और कांटेदार कैक्टस प्रजाति स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम फल मानी जाती है। ड्रैगन फ्रूट का इस्तेमाल च्युइंग गम और अन्य जड़ी-बूटियों में भी किया जाता है। इसलिए बाजार में भी काफी तेजी आई है। Sabhar www.sanjeevanitoday.com

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Monday, January 24, 2022

खीरे का निर्यात बढ़ा

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 पहले खीरा और ककड़ी जैसी फसलों की खेती एक खास सीजन में ही होती थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उन्नत किस्मों के बीज और पॉली हाउस जैसे माध्यमों की मदद से अब सालभर खीरा और ककड़ी की खेती होती है। तभी तो भारत दुनिया में ककड़ी और खीरे का सबसे बड़ा निर्यातक बनकर उभरा है। वाणिज्‍य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार भारत ने अप्रैल-अक्टूबर (2020-21) के दौरान 114 मिलियन अमरीकी डालर के मूल्य के साथ 1,23,846 मीट्रिक टन ककड़ी और खीरे का निर्यात किया है। भारत ने पिछले वित्तीय वर्ष में कृषि प्रसंस्कृत उत्पाद के निर्यात का 200 मिलियन अमरीकी डालर का आंकड़ा पार कर लिया है, इसे खीरे के अचार बनाने के तौर पर वैश्विक स्तर पर गेरकिंस या कॉर्निचन्स के रूप में जाना जाता है। 2020-21 में, भारत ने 223 मिलियन अमरीकी डालर के मूल्य के साथ 2,23,515 मीट्रिक टन ककड़ी और खीरे का निर्यात किया था। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत वाणिज्य विभाग के निर्देशों का पालन करते हुए, कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए) ने बुनियादी ढांचे के विकास, वैश्विक बाजार में उत्पाद को बढ़ावा देने और प्रसंस्करण इकाइयों में खाद्य सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली के पालन में कई पहल की हैं। खीरे को दो श्रेणियों ककड़ी और खीरे के तहत निर्यात किया जाता है जिन्हें सिरका या एसिटिक एसिड के माध्यम से तैयार और संरक्षित किया जाता है, ककड़ी और खीरे को अनंतिम रूप से संरक्षित किया जाता है। सबसे पहले कर्नाटक से हुई थी निर्यात की शुरूआत खीरे की खेती, प्रसंस्करण और निर्यात की शुरूआत भारत में 1990 के दशक में कर्नाटक में एक छोटे से स्तर के साथ हुई थी और बाद में इसका शुभारंभ पड़ोसी राज्यों तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी हुआ। विश्व की खीरा आवश्यकता का लगभग 15% उत्पादन भारत में होता है। खीरे को वर्तमान में 20 से अधिक देशों को निर्यात किया जाता है, जिसमें प्रमुख गंतव्य उत्तरी अमेरिका, यूरोपीय देश और महासागरीय देश जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, दक्षिण कोरिया, कनाडा, जापान, बेल्जियम, रूस, चीन, श्रीलंका और इजराइल हैं। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए 65000 एकड़ में होती है खीरे की खेती अपनी निर्यात क्षमता के अलावा, खीरा उद्योग ग्रामीण रोजगार के सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत में, अनुबंध खेती के तहत लगभग 90,000 छोटे और सीमांत किसानों द्वारा 65,000 एकड़ के वार्षिक उत्पादन क्षेत्र के साथ खीरे की खेती की जाती है। प्रसंस्कृत खीरे को औद्योगिक कच्चे माल के रूप में और खाने के लिए तैयार करके जारों में थोक में निर्यात किया जाता है। थोक उत्पादन के मामले में एक उच्च प्रतिशत का अभी भी खीरा बाजार पर कब्जा है। भारत में ड्रम और रेडी-टू-ईट उपभोक्ता पैक में खीरा का उत्पादन और निर्यात करने वाली लगभग 51 प्रमुख कंपनियां हैं। एपीडा ने प्रसंस्कृत सब्जियों के निर्यात को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और यह बुनियादी ढांचे के विकास और संसाधित खीरे की गुणवत्ता बढ़ाने, अंतरराष्ट्रीय बाजार में उत्पादों को बढ़ावा देने और प्रसंस्करण इकाइयों में खाद्य सुरक्षा प्रबंधन प्रणालियों के कार्यान्वयन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है। औसतन, एक खीरा किसान प्रति फसल 4 मीट्रिक टन प्रति एकड़ का उत्पादन करता है और 40,000 रुपये की शुद्ध आय के साथ लगभग 80,000 रुपये कमाता है। खीरे में 90 दिन की फसल होती है और किसान वार्षिक रूप से दो फसल लेते हैं। विदेशी खरीदारों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित किए गए हैं। सभी खीरा उत्पादन और निर्यात कंपनियां या तो आईएसओ, बीआरसी, आईएफएस, एफएसएससी 22000 प्रमाणित और एचएसीसीपी प्रमाणित हैं या सभी प्रमाणपत्र रखती हैं। कई कंपनियों ने सोशल ऑडिट को अपनाया है। यह सुनिश्चित करता है कि कर्मचारियों को सभी वैधानिक लाभ दिए जाएं।

Sabhar :
https://www.gaonconnection.com/desh/which-states-maximum-farmers-get-the-benefit-of-msp-it-is-not-haryana-or-punjab-48592?infinitescroll=1

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